मुझे आज के बच्चों पर तरस आता है

हो सकता है कि मेरे इस बात से बहुत लोग इत्तेफ़ाक़ ना रखें लेकिन इस ब्लॉग को पढना ज़रूर चाहेंगे। अंग्रेजीयत की होड़ में माँ बाप भूलते जा रहे हैं कि उनके बच्चे कहीं कुछ दूर होते जा रहे हैं अपनी मिट्टी से। ख़ासकर बड़े शहरों के बच्चे बहुत confused नज़र आते हैं।


             जब हम बच्चे थे तो वह दौर अलग था। हम भारत के एक गांव में पले बढे। खुला मैदान , खुले खुले घर और सबकुछ खुला खुला । खुली हवा में खुलकर सांस लिए हुए बच्चे थे हम। ऑक्सीजन से भरा हुआ फेफड़ा। पेड़ से तोड़कर आम खाया हुआ बच्चा। सर से पेड़ पर चढ जाते थे। पहले पेट भरकर पके हुए आम खा लेते फिर नीचे गिराते घर ले जाने के लिए। हमारे हर सांस में गांव की मिट्टी का गंध बसा हुआ है। हम आज जब शहर में रहते हैं तब भी शरीर से मिट्टी की बास आती है। Modern बनना बहुत ज़रूरी है लेकिन उसमें अपनी हिन्दुस्तानी मिट्टी की गंध होनी चाहिए। 


मेरा सिर्फ इतना कहना है कि बच्चों को mod बनाईए लेकिन उसमें हिन्दुस्तानियत और इंसानियत का तड़का ज़रूर रहनी चाहिए। शहरी मां बाप अपने बच्चों को भारत के गांव तो दिखा ही सकते हैं अगर आप उसको छुट्टियों में foreign tour पर ले जा सकते हैं। हमारी संस्कृति हमारी मिट्टी की गंध हमारे बच्चों से मत छीनिए। कुछ समय अपनी मिट्टी से परिचय कराने में लगाईए। बाकी तो पूरी ज़िंदगी शहर में रहना ही है।


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